Monday, June 1, 2026
No Result
View All Result
SUBSCRIBE
Pravasi Indians Magazine
  • Home
  • Cover Story
  • Books
  • Business
  • Diaspora
  • Spaces
  • Interviews
  • International
  • National
  • Arts & Culture
  • E-Magazine
  • Home
  • Cover Story
  • Books
  • Business
  • Diaspora
  • Spaces
  • Interviews
  • International
  • National
  • Arts & Culture
  • E-Magazine
No Result
View All Result
Pravasi Indians Magazine
  • SIGN IN
Home Arts & Culture

जो भी है, बस यही एक पल है

एक श्रोता की डायरी

May 31, 2026
in Arts & Culture

पुराने गीतों की दुनिया में लौटना कभी-कभी अपने ही जीवन में लौटना होता है। इस लेख में फिल्मों, गायकों और रेडियो कार्यक्रमों की यादों के बीच एक व्यक्ति अपने समय, अपने स्वाद और अपनी सीमाओं को टटोलता चलता है। आशा भोसले की आवाज़ यहाँ सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि बीते हुए दशकों की धड़कन बनकर आती है। लेख आगे बढ़ते-बढ़ते जीवन, मृत्यु, स्मृति और विरासत पर एक शांत चिंतन में बदल जाता है।

Byline: राहुल उपाध्याय, सिएटल

लेखक पिछले चार दशक से अमेरिका में रहते हुए कविताएँ लिखते हैं और प्रवासी भारतीयों के द्वंद्व और दुविधाओं को उजागर करते हैं।

 

बचपन से ही फिल्में देखना और गाने सुनना बहुत पसंद रहा। वही एक मनोरंजन का साधन था। फिल्में बहुत बाद में देखनी शुरू कीं, जब हम मेरठ रहने लगे। तब मैं पांचवीं कक्षा में था। बहुत अच्छी-अच्छी फिल्में देखीं—आनंद, अनुराग, दाग। ये सब राजेश खन्ना के जमाने की फिल्में हैं। उनमें मुख्य रूप से गायकों के गीत ही प्रभावित करते थे, जैसे किशोर कुमार। बाद में मोहम्मद रफी, मन्ना डे, मुकेश—इनसे भी परिचित हुआ, पर गायिकाओं की तरफ रुझान नहीं हुआ। बाद में जब हुआ भी, तो लता के गीत ज्यादा पसंद आए।

जब बनारस में मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था, तब उमराव जान के गाने बहुत अच्छे लगे और तब समझ में आया कि आशा भोसले भी कितना अच्छा गाती हैं। पर निकाह के गानों की वजह से सलमा आगा भी उतनी ही अच्छी लगती थीं। और यह बहुत बाद में पता चला कि आशा भोसले, लता मंगेशकर की बहन हैं। यह सोचकर अभी भी आश्चर्य होता है कि शादी से पहले उन्होंने कभी गाना नहीं गाया। आशा मंगेशकर के नाम से उनका कोई गीत मैंने नहीं देखा है। वैसे तो गायिकाएं बहुत कम उम्र से गाना शुरू कर देती हैं और आशा जी ने भी किया ही होगा। लता जी की बहन होने से फायदा भी होना चाहिए था, पर सुना है कि उससे नुकसान भी बहुत हुआ। क्योंकि कहते हैं कि बरगद के पेड़ के नीचे छोटे-छोटे पेड़ उग नहीं पाते।

बहरहाल, यह सब जानकारी विकिपीडिया पर होगी, जरूर होगी, पर मैं आजकल बहुत कम ही इधर-उधर खोजबीन करता हूँ। जितना मेरे जीवन में आ पाया, उतना ही मैं समझता हूँ। अब आधे घंटे विकिपीडिया पढ़कर मैं यह नहीं बताना चाहता कि मुझे इनकी यह जानकारी है, इनकी वो जानकारी है। हाँ, मुझे यह भी पता है कि इनकी पहली शादी किसी भोसले से हुई थी और फिर वह ठीक नहीं चली। बाद में इन्होंने पंचम—यानी राहुल देव बर्मन—के साथ शादी की और वह भी शायद ठीक नहीं चली। पता नहीं, पर ये साथ में कभी रहे नहीं। इनकी कोई संतान भी नहीं हुई। और बीच में शायद ओ. पी. नैयर के साथ भी इनका कुछ जुड़ाव रहा और सुनते हैं कि एक बार उनके बीच बहुत झगड़ा हो गया। तो खैर, यह तो आपसी रिश्तों की बातें हैं। पर गायिका के रूप में वे बहुत अच्छा गाती थीं और इनके बहुत सारे गीत हैं, जिनकी बहुत लंबी सूची बनाई जा सकती है। पर फिर भी शायद उमराव जान और इजाज़त के गीत ही ज्यादा जहन में आएंगे। बाकी सब शायद दिमाग पर जोर देने पर, ढूंढने पर मिल भी सकते हैं।

अब बात है इनके गुजरने की। उम्र 92 साल थी। पिछले एक साल तक वे कुछ गा भी रही थीं—किसी शो में, स्टेज पर, किसी न किसी कार्यक्रम में। पर फिल्मों में तो उन्हें गायन नहीं मिल रहा था।

मुझे गायकी की ज्यादा जानकारी नहीं है। मेरे घर हर महीने के चौथे शनिवार को जब गोष्ठी होती है, तो जो भी गाता है, मुझे अच्छा ही लगता है। पर जहां तक फिल्मों की बात है, फिल्मों में शायद उन्हें ही लिया जाता है जिनके गायन में दम होता है। मैं फिल्मों में गायन को ही गुणवत्ता का आधार समझता हूँ। मुझे नहीं लगता कि पिछले कुछ सालों में उन्हें किसी फिल्म में काम मिला था, या उन्होंने कोई गीत गाया था। अब कुछ फिल्मकार हैं जिनकी अपनी पसंद-नापसंद होती है। उनमें यश चोपड़ा और बड़जात्या परिवार हैं। उन्हें लता मंगेशकर से काफी लगाव था। वे चाहते थे कि लता जी उनके लिए जरूर गाएं। इसी के चलते वीर-ज़ारा में लता जी ने यश चोपड़ा के लिए गीत गाए। फिर भी सब गीत अच्छे नहीं लगे। एकाध गीत में तो लगा कि लता जी थक गई थीं। उन्होंने भी अपनी दोस्ती के चलते वे गीत गा दिए, वरना उन्होंने भी गायन लगभग बंद कर दिया था।

कलाकारों के लिए तो मैं कहूँगा कि जीवन चाहे जितना लंबा हो, लेकिन जो श्रोता हैं, जो दर्शक हैं, उनके लिए उनका जीवन उतना ही सीमित है, जितना समय तक वे कार्यरत थे, जब तक उनका काम सामने आ रहा था और सराहा जा रहा था। उसके बाद की जिंदगी तो परिवार के लिए है। जो जितना जिए, उतना अच्छा।

अब लोग कहते हैं कि यह एक अपूरणीय क्षति है। मैं समझ नहीं पाता कि यह कैसे कहा जाए। हर इंसान का जाना एक अपूरणीय क्षति है, तो फिर किसी एक खास व्यक्ति के लिए ही क्यों कहा जाए? जब सबके लिए अपूरणीय क्षति है, तो इसमें क्या बड़ी बात हो गई? खैर, ये तो मेरा ही टेढ़ा दिमाग है, जो ऐसा सोचता है।

लता जी को लोग लता दी या लता दीदी कहते थे। आशा जी को आशा ताई। ऐसा क्यों? मेरी समझ से परे है। शायद इसलिए कि दीदी ने शादी नहीं की और ताई ने कर ली। खैर, मेरी समझ से परे है।

कुछ गीत आशा और लता, दोनों ने साथ भी गाए हैं। अब पता नहीं, उस जमाने में तो साथ में ही गाए होंगे। आजकल तो खैर, कोई भी साथ-साथ नहीं गाता। पहले एक आदमी गा लेता है, फिर दूसरा गा लेता है, फिर जोड़ दिया जाता है। उत्सव का एक गीत है—“मन क्यों बहका रे बहका।” वह लता और आशा, दोनों ने गाया है और बहुत ही सुंदर बन पड़ा है। इस गीत की खासियत यह भी है कि इसके संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल हैं। आमतौर पर कलात्मक फिल्मों का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ नहीं जोड़ा जाता, और यह इस फिल्म की खासियत थी।
https://youtu.be/tyOAj-4sPdw?si=K8Lt8B1yYOWaOg6H

“ये साए हैं, ये दुनिया है”—यह गीत मुझे उनका बहुत ही पसंद है। उसे मैं सैकड़ों बार, हजारों बार सुन सकता हूँ और कभी भी मन नहीं भरेगा।
https://youtu.be/USEXZM6mMIQ?si=If9sj8JdSVtQ09Yg

तीसरी मंजिल का गाना “आजा आजा मैं हूँ प्यार तेरा”। यह गीत आशा जी को बहुत पसंद था, क्योंकि इसमें उस समय के लिए कुछ नवीनता थी। यह एक डांस नंबर था और इसमें कई तरह के प्रयोग किए गए थे—डांस नंबर के हिसाब से। वैसे मुझे इसमें कोई माधुर्य नजर नहीं आता।

उनकी एक और बात मुझे अच्छी लगती थी। वह यह कि वे जब भी किसी कार्यक्रम में जाती थीं, जहाँ कुछ लोग अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते थे, तब वे उन गीतों को ध्यान से सुनती थीं। चाहे वे उनके अपने गीत हों या किसी और के, वे हमेशा उनमें कुछ न कुछ सुधार की गुंजाइश ढूंढती थीं और खुलकर बताती थीं। उन्हें यह नहीं लगता था कि अरे, अभी तो नए-नए बच्चे हैं, जितना कर रहे हैं बहुत अच्छा कर रहे हैं, छोटी-बड़ी गलतियाँ नजरअंदाज कर देनी चाहिए।

कुछ लोग कहते हैं कि राष्ट्रीय शोक मनाया जाना चाहिए था। उन्हें भी भारत रत्न दिया जाना चाहिए था। खैर, सबकी अपनी मजबूरियाँ हैं। लेकिन मुझे अच्छा लगा कि विविध भारती पर यूनूस खान ने सजीव प्रसारण किया और आशा जी के कुछ गैर-फिल्मी गीत भी सुनाए, जो ज्यादा प्रचलित नहीं हैं। सजीव प्रसारण मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।

ग़ैर-फ़िल्मी गीतों में जो मुझे बहुत पसंद है, वह है कामायनी का यह गीत। जयशंकर प्रसाद के शब्दों को लयबद्ध करने का कमाल जयदेव ने किया था।
https://youtu.be/ipsbfYhv0AI?si=XamiV-xGHK7Ppm6z

पहले भी रिकॉर्ड करके ही कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते थे, पर आजकल ज्यादातर कार्यक्रम रिकॉर्ड किए हुए होते हैं। बिनाका गीतमाला भी 40 साल पहले रिकॉर्डेड ही होता था। मुंबई में रिकॉर्ड होता था, फिर श्रीलंका जाता था और वहाँ से प्रसारित होता था। पर मैं हमेशा भ्रम में रहा कि यह सजीव था।

सजीव प्रसारण में यूनुस खान का गला रुंध गया और वे बता रहे थे कि आँखें नम-सी हो रही हैं। यह भावुकता सिर्फ सजीव प्रसारण में ही हो सकती है और इसीलिए मेरे मन में सजीव प्रसारण के लिए खास स्थान है।

जिस दिन आशा जी गुजरीं, मैं एक गोष्ठी में शामिल था और वहाँ बिना यह जाने कि आशा जी गुजर चुकी हैं, किसी ने अपने जीवन का सबसे पसंदीदा गीत बहुत सालों बाद पहली बार गाया—“आगे भी जाने ना तू”। और वह बहुत ही अच्छा रहा। मुझे लगता है कि एक तरह से हम लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

जो भी है, बस यही एक पल है।

मैं 63 वर्ष का हूँ और अब मुझे लग रहा है कि मेरे जाने के बाद मेरी संपत्ति का सदुपयोग हो। इसलिए इन दिनों मैं एक ऐसी योजना से जुड़ गया हूँ, जहाँ मुझे लगता है कि पैसा सही जगह काम आएगा। परिवार को तो देना नहीं है। परिवार के पास समुचित धन है, समुचित शिक्षा है, समुचित क्षमता है, जिससे वे अपना जीवन सुख से बिता सकें। मुझे लगता है कि नोबेल पुरस्कार एक अच्छा पुरस्कार है। उसमें भी कुछ गुण-दोष जरूर हैं, पर फिर भी कई तरह से, कई मायनों में वह अच्छा है। मैं भी उसी की पद्धति पर कुछ आगे सोच रहा हूँ। नाम सोच लिया है—“प्रकाश पुरस्कार”। प्रकाश मेरी माँ का नाम है।

Blurb-1

आशा भोसले के बहाने पुराने फिल्मी संगीत, रेडियो और निजी स्मृतियों की एक आत्मीय यात्रा।

Blurb-2

लेखक का मानना—हर व्यक्ति का जाना अपूरणीय क्षति है, सिर्फ प्रसिद्ध लोगों का नहीं।

Blurb-3

विविध भारती, सजीव प्रसारण और पुराने गीतों से जुड़ी भावनाओं का दुर्लभ और निजी चित्रण।

Blurb-4

लता मंगेशकर और आशा भोसले को लेकर एक साधारण श्रोता की असामान्य लेकिन ईमानदार राय।

Blurb-5

“मन क्यों बहका रे बहका” से “आगे भी जाने ना तू” तक—गीतों के सहारे खुलती जीवन की परतें।

Blurb-6

संगीत की चर्चा से शुरू होकर लेख जीवन, मृत्यु और विरासत के प्रश्नों तक पहुँचता है।

ShareTweetShare

Related Posts

Arts & Culture

जो भी है, बस यही एक पल है

Arts & Culture

An Extravaganza of Artistic Fusion

Arts & Culture

Preserving Gondal’s heritage

Arts & Culture

Confluence of Art & Culture with Technology

Arts & Culture

डायस्पोरा फ़ैशन में  ड्रेसिंग स्टाइल और प्रियंका चोपड़ा

Arts & Culture

Emotion swirling around tech

Remember Me
Register
Lost your password?
Pravasi Indians Magazine

PRAVASI INDIANS has become voice of the millions of overseas Indians spread across the globe. A M/s Template Media venture, this magazine is the first publication exclusively dealing with a wide gamut of issues that matter to the Indian diaspora.

Contact Us

M/s Template Media LLP
(Publisher of PRAVASI INDIANS),
34A/K-Block, Saket,
New Delhi-110017
www.pravasindians.com


Connect with us at:
Mobile: +91 98107 66339
Email: info@pravasindians.com

Categories

  • E-Magazine
  • World
  • Lifestyle
  • State
  • Philanthropy
  • Literature
  • Education
  • Tourism
  • Sports
  • Spotlight
  • Politics
  • Governance & Policy

Categories

  • Collaboration
  • Guest Article
  • National
  • Environment
  • Cinema
  • Food and Travel
  • Young and Restless
  • Heritage
  • News
  • Opinion
  • Spaces
  • About Us
  • Advertise With Us
  • Archives
  • Our Team
  • Support Us
  • Privacy Policy
  • Terms and conditions
  • Contact Us

Copyright 2023@ Template Media LLP. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • Books
  • Business
  • Arts & Culture
  • Diaspora
  • Spaces
  • Interviews
  • E-Magazine

Copyright 2023@ Template Media LLP. All Rights Reserved.

This website uses cookies. By continuing to use this website you are giving consent to cookies being used. Visit our Privacy and Cookie Policy.