भारत में न्यायाधीशों के खिलाफ कार्रवाई की संवैधानिक व्यवस्था इतनी कठिन है कि अब तक कोई भी न्यायाधीश महाभियोग के जरिये पद से नहीं हटाया जा सका। ऐसे में सवाल उठता है कि न्यायिक भ्रष्टाचार या दुराचार के मामलों में जवाबदेही कैसे तय हो। यह लेख न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा प्रकरण के बहाने इसी जटिल प्रश्न की पड़ताल करता है।
Byline: सुधांशु रंजन
लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार, विपुल लेखक हैं जो हाल ही में दूरदर्शन और आकाशवाणी से सेवानिवृत्त हुए हैं और कई किताबें जिनमें जस्टिस, ज्यूडोक्रेसी, एंड डेमोक्रेसी: बाउंड्रीज़ एंड ब्रीचेज़ (रूटलेज) और जस्टिस वर्सेज ज्यूडिशियरी: जस्टिस एन्थ्रोन्ड ऑर एंटैंगल्ड इन इंडिया (ऑक्सफ़ोर्ड) प्रमुख है लिख चुके हैं।
न्यायिक जवाबदेही को लेकर काफी लंबे समय से बहस चल रही है। फिलहाल न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के इस्तीफे के बाद इस पर बहस फिर से तेज़ हो गई है। वे गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे थे। जब वे दिल्ली उच्च न्यायालय में पदस्थापित थे, तब उनके बंगले के आउटहाउस से कथित तौर पर पंद्रह करोड़ रुपए बरामद हुए थे। गैर-सरकारी सूत्रों के अनुसार यह राशि उससे कहीं अधिक थी। आनन-फानन में उनका स्थानांतरण इलाहाबाद उच्च न्यायालय कर दिया गया। इसका वहाँ के वकील संघों ने शुरू में विरोध भी किया था।
न्यायिक जवाबदेही के दायरे में भ्रष्टाचार के अलावा और भी कई मुद्दे आते हैं। मसलन, अपनी सीमा-रेखा भूलकर दूसरों के अधिकार-क्षेत्र में अतिक्रमण करना, आम आदमी के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में कई बार विफल रहना, सूचना का अधिकार अधिनियम को अपने ऊपर लागू न होने देना, मुकदमों का दशकों तक लंबित रहना और भ्रष्टाचार। हालात कितने संगीन हैं, यह इसी से स्पष्ट है कि १२ जनवरी २०१८ को भारत के मुख्य न्यायाधीश के बाद उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाया था कि शीर्ष अदालत में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है। उन्होंने कहा था कि मुख्य न्यायाधीश संवेदनशील मामलों को अपनी पसंद की कुछ खास पीठों को सौंप रहे हैं। हालांकि फिलहाल बात भ्रष्टाचार की हो रही है। वैसे इन चारों न्यायाधीशों का व्यवहार भी किसी पैमाने पर पूरी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सरकारी अधिकारी और मंत्री केवल आरोप के आधार पर गिरफ्तार कर लिए जाते हैं, उन्हें पद छोड़ने पड़ते हैं और उनके विरुद्ध मुकदमे भी चलाए जाते हैं। ऐसा न्यायाधीशों के मामले में प्रायः नहीं होता।
न्यायमूर्ति वर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की एक कमिटी ने उन्हें दोषी करार देते हुए उन्हें हटाए जाने की अनुशंसा की। वर्मा ने जांच प्रक्रिया को शीर्ष अदालत में चुनौती दी, जिसे उसने खारिज कर दिया। उन्हें पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाया गया। आम बातचीत में इसे महाभियोग कहा जाता है, हालांकि संविधान में यह शब्द नहीं है। उनके त्यागपत्र के बाद यह प्रस्ताव निष्फल हो गया। अतीत में कुछ अवसरों पर न्यायाधीशों के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव संसद में लाए गए, लेकिन एक भी पारित नहीं हो सका। केवल न्यायमूर्ति सौमित्र सेन के विरुद्ध राज्य सभा में प्रस्ताव पारित हुआ था और लोक सभा इस पर विचार करती, उसके पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। किसी सरकारी कर्मी का इस्तीफा निगरानी विभाग की क्लीन चिट के बिना स्वीकार नहीं किया जाता। फिर न्यायाधीशों के मामले में यह दोहरा मापदंड क्यों?
जब संविधान लिखा जा रहा था, तब फेडरल कोर्ट (जो बाद में सुप्रीम कोर्ट बना) के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को पत्र लिखकर कहा था कि न्यायपालिका की स्वायत्तता सुनिश्चित की जाए। पटेल ने तुरंत जवाब दिया कि न्यायाधीश नैतिक अभिभावक की भूमिका में होंगे, इसलिए उन पर किसी तरह की निगरानी की आवश्यकता नहीं होगी। यही कारण है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९४७ में न्यायाधीशों के बारे में सीधी चर्चा नहीं है। इसकी धारा २ में कहा गया है कि जन सेवक (पब्लिक सर्वेंट) की परिभाषा वही है जो भारतीय दंड विधान की धारा २१ में दी गई है। इसमें न्यायाधीश को भी शामिल किया गया है। १९६४ में के. संथानम कमिटी की रिपोर्ट में भी न्यायाधीशों पर विशेष चर्चा नहीं है। यानी यह मान लिया गया था कि न्यायिक भ्रष्टाचार एक विरलतम चीज़ होगी।
के. वीरास्वामी मामले (१९९१) में उच्चतम न्यायालय की एक संविधान पीठ ने माना कि भारतीय दंड विधान की धारा २१ के अंतर्गत न्यायाधीश जन सेवक हैं, लेकिन साथ ही यह व्यवस्था भी दी कि उच्च या उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश की पूर्वानुमति अनिवार्य होगी। न्यायाधीशों और न्यायपालिका की स्वायत्तता के लिए यह सुरक्षा शायद जरूरी भी है। जो पहला महाभियोग प्रस्ताव किसी जज के विरुद्ध लाने की कोशिश की गई थी, वह न्यायमूर्ति जे. सी. शाह के खिलाफ था। विडंबना यह है कि न्यायमूर्ति शाह अपनी ईमानदारी के लिए प्रशंसित थे। उन्हें उनकी शुचिता के लिए दंडित करने का षड्यंत्र एक बेईमान नौकरशाह द्वारा रचा गया था, जिसके खिलाफ उन्होंने एक निर्णय दिया था। उस नौकरशाह ने १९९ सांसदों के हस्ताक्षर महाभियोग प्रस्ताव पर करवा लिए थे। लेकिन तत्कालीन लोक सभा अध्यक्ष गुरदयाल सिंह ढिल्लों ने सांसदों को समझाकर मामला आगे बढ़ने नहीं दिया।
वीरास्वामी मामले में दी गई व्यवस्था के अनुसार भारत के मुख्य न्यायाधीश की अनुमति के बाद भ्रष्टाचार के आरोपित न्यायाधीश के ऊपर प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है। सवाल यह है कि सरकार ने मुख्य न्यायाधीश की अनुमति क्यों नहीं मांगी। उच्चतम न्यायालय स्वयं भी सुओ मोटो संज्ञान लेकर प्राथमिकी दर्ज करवा सकता था। जांच के बाद सच सामने आता। यदि किसी मंत्री या सरकारी अधिकारी पर आरोप लगता है, तो केवल पद छोड़ देने से उसे मुक्ति नहीं मिलती। उस पर मुकदमा चलता है। लेकिन न्यायाधीशों के मामले में प्रतिमान अलग दिखाई देते हैं। अतीत में जिनके विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव आया, उन्होंने इस्तीफा दे दिया और मामला वहीं समाप्त हो गया, जबकि आरोप गंभीर थे।
अनेक राष्ट्रों में न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाए गए हैं। अमेरिका में ज्यूडिशियल काउंसिल रिफॉर्म्स एंड ज्यूडिशियल कंडक्ट एंड डिसेबिलिटी एक्ट, १९८० लागू है। जर्मनी में जजेज डिसिप्लिनरी कमिटी है। कनाडा में ज्यूडिशियल काउंसिल १९७१ से कार्यरत है। भारत में भी ऐसे किसी कानून की आवश्यकता है, क्योंकि महाभियोग की व्यवस्था व्यावहारिक नहीं है। इसकी प्रक्रिया इतनी जटिल है कि आज तक एक भी न्यायाधीश को महाभियोग के जरिए हटाया नहीं जा सका। जब न्यायाधीशों को इतनी सुरक्षा दी गई थी, तब न्यायिक भ्रष्टाचार लगभग कल्पनातीत माना जाता था। लेकिन हाल के दशकों में न्यायिक भ्रष्टाचार के उदाहरण बार-बार सामने आ रहे हैं। न्यायपालिका पर जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उसकी जवाबदेही सुनिश्चित और प्रभावी बनाई जाए। यह लोकतंत्र और न्यायपालिका—दोनों के हित में होगा।
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न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा प्रकरण ने फिर उठाया सवाल—क्या न्यायपालिका की मौजूदा जवाबदेही व्यवस्था पर्याप्त है?
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महाभियोग की जटिल प्रक्रिया और न्यायिक स्वायत्तता के बीच जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत पर गंभीर विमर्श।

